


एक कलाकार पारंपरिक ‘घोड़ी’ (डमी हॉर्स) पोशाक में सजे हुए हैं, जो प्रसिद्ध कच्छी घोड़ी / भवई नृत्य का प्रतिनिधित्व करती है। यह नृत्य राजस्थान की वीरता, लोककथाओं और पारंपरिक योद्धा परंपराओं को दर्शाता है।
दूसरा कलाकार रंग-बिरंगी राजस्थानी छतरी थामे हुए पूरे उत्साह के साथ नृत्य कर रहा है, जो पूरे मंच में ऊर्जा और उत्सव का माहौल भर देता है।
तीसरी कलाकार पीले और मरून रंग की राजस्थानी लहंगा-चोली में सजी हुई हैं, जिनकी मनोहारी नृत्य-भंगिमाएं कालबेलिया या घूमर नृत्य की कोमलता और सौंदर्य को दर्शाती हैं।
दर्शकों की उत्साहपूर्ण सहभागिता
चारों ओर खड़े दर्शक उत्सुकता से प्रदर्शन को देख रहे हैं, मोबाइल से वीडियो बना रहे हैं और इस सांस्कृतिक प्रस्तुति का भरपूर आनंद ले रहे हैं।
पीछे सजे हुए स्टॉल, झिलमिलाती रोशनी और मेले जैसा वातावरण — पूरे दृश्य को अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव की भव्यता और उत्सव-भावना से भर देता है।
सांस्कृतिक महत्व
ऐसी प्रस्तुतियाँ:
भारत की विविध लोक-संस्कृतियों का सम्मान करती हैं
राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सामने लाती हैं
नृत्य, संगीत, लोककथाओं और उत्सव की परंपरा को जीवित रखती हैं
यह प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव किस प्रकार पूरे भारत की कला और संस्कृति को एक मंच पर लाकर एकता, परंपरा और सांस्कृतिक सौहार्द का संदेश देता है।